आज हम आपके साथ ब्रह्मा और विष्णु का युद्ध (Brahma Aur Vishnu Ka Yuddh) व उससे जुड़े रोचक प्रसंग को सांझा करने वाले हैं। यह कथा शिव पुराण में लिखी गई है जिसमें भगवान विष्णु व भगवान ब्रह्मा के बीच हुए विवाद व शिवलिंग के महत्व को बताया गया है। यह कहानी हमें अंत में एक शिक्षा भी देगी।
कहानी सांझा करने से पहले हम आपको बता देना चाहते हैं कि तीनों देव ब्रह्मा, विष्णु व महेश एक ही हैं व तीनों में कोई अंतर नहीं है। यह कथाएं केवल हमें शिक्षा देने के उद्देश्य से लिखी गई हैं। इसलिए आप कथाओं का कुछ गलत अर्थ निकाल कर तीनों में से कौन ज्यादा महान है व कौन कम, यह सोचने मत लग जाइएगा। आइए ब्रह्मा विष्णु की लड़ाई (Brahma Vishnu Ki Ladai) से जुड़ी इस रोचक कथा के बारे में जान लेते हैं।
ब्रह्मा और विष्णु का युद्ध
भगवान ब्रह्मा को इस सृष्टि व सभी मनुष्यों, जीव-जंतुओं इत्यादि का रचियता माना जाता है अर्थात सभी जीवों को बनाने वाले स्वयं ब्रह्मा जी हैं। किंतु एक दिन ब्रह्मा जी के मन में स्वयं की उत्पत्ति का प्रश्न आया तो उन्होंने इसको जानने की इच्छा से तप किया। कई दिनों तक तप करने के पश्चात उन्हें ज्ञात हुआ कि जिस कमल पर वे बैठे हैं वह भगवान विष्णु की नाभि में से निकला है व उसी में से भगवान ब्रह्मा की उत्पत्ति हुई है।
यह देखकर वे भगवान विष्णु के पास गए व उनसे स्वयं को श्रेष्ठ बताया। भगवान विष्णु ने भी स्वयं को ब्रह्मा से श्रेष्ठ बताया व कहा कि तुम्हारी उत्पत्ति का कारण मैं हूँ इसलिए मैं तुमसे ज्यादा महान हूँ। इस बात पर दोनों में अहंकार उत्पन्न हुआ व बात युद्ध तक आ (Brahma Aur Vishnu Ka Yuddh) पहुंची।
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शिव का अग्निलिंग के रूप में प्रकट होना
भगवान शिव दूर से बैठे यह सब देख रहे थे। उनके विवाद को समाप्त करने के उद्देश्य से वे उनके सामने अग्निलिंग के रूप में प्रकट हुए। उस अग्निलिंग का ना ही कोई आदि था व ना ही कोई अंत अर्थात यह अग्निलिंग कहां से शुरू होता है व कहां पर समाप्त, वह दिखाई नहीं पड़ रहा था।
अपने सामने इतने बड़े अग्निलिंग को देखकर भगवान ब्रह्मा व विष्णु चकित रह गए। तब दोनों ने निश्चय किया कि जो इसका पहले आदि या अनंत ढूंढ लाएगा वह जीत जाएगा। तब भगवान विष्णु अपने वाहन गरुड़ पर बैठकर उस अग्निलिंग के नीचे की ओर उसका अंत ढूंढने गए व भगवान ब्रह्मा अपने वाहन हंस पर बैठकर ऊपर की ओर।
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ब्रह्मा विष्णु की लड़ाई व शिव का क्रोध
Brahma Vishnu Ki Ladai में असली मोड़ अब आएगा। भगवान विष्णु बहुत दूर तक गए लेकिन उन्हें उस अग्निलिंग का अंत नहीं मिला। अंत में भगवान विष्णु ने थककर अपनी हार मान ली व वापस आ गए। भगवान ब्रह्मा को भी उस अग्निलिंग का अंत नहीं मिला व वे भी वापस आ गए। भगवान विष्णु ने ब्रह्मा जी के सामने अपनी हार स्वीकार की व उस अग्निलिंग का अंत ढूंढने में असमर्थता जताई।
दूसरी ओर, भगवान ब्रह्मा ने विष्णु से असत्य बताया व कहा कि उन्हें उसका अंत मिल गया है। ब्रह्मा जी के मुख से यह झूठ सुनकर शिवजी अत्यंत क्रोधित हो गए और उनसे भैरव अवतार ने जन्म लिया। भैरव अवतार ने अपने बाएं हाथ की छोटी ऊँगली के नाखून से भगवान ब्रह्मा का पांचवां मस्तक जिसने झूठ बोला था, वह काट दिया।
तब भगवान शिव का क्रोध भगवान विष्णु ने शांत किया व ब्रह्मा जी को क्षमा करने का आग्रह किया। भगवान शिव का क्रोध शांत हुआ व उन्होंने विष्णु को अपने समान पूजे जाने व ब्रह्मा को ना पूजे जाने की बात कही। तब से भगवान शिव के भैरव अवतार की भी पूजा की जाने लगी।
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ब्रह्मा विष्णु युद्ध से मिलती शिक्षा
Brahma Vishnu Yudh से जुड़ी इस कहानी से हमें यह शिक्षा मिलती है कि यदि व्यक्ति किसी कार्य को करने में असमर्थ हो तो उसे अपनी असफलता को स्वीकार कर लेना चाहिए जैसा स्वयं भगवान विष्णु ने किया था। साथ ही यदि वह अपनी असफलता को ध्यान में ना रखकर लोगों के सामने असत्य का सहारा लेगा व अपनी क्षमता का अनावश्यक बखान करेगा तो उस पर कोई भी विपत्ति आ सकती है।
इस तरह से आज के इस लेख में आपने ब्रह्मा और विष्णु का युद्ध (Brahma Aur Vishnu Ka Yuddh) व उससे जुड़ी कथा के बारे में जान लिया है। आशा है कि आपको इस कहानी व उससे मिली शिक्षा को पढ़कर अच्छा लगा होगा।
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