कल्पेश्वर महादेव मंदिर की यात्रा व ट्रेक की संपूर्ण जानकारी

Kalpeshwar Mahadev Mandir

कल्पेश्वर महादेव मंदिर (Kalpeshwar Mahadev Mandir) उत्तराखंड राज्य के चमोली जिले में स्थित पंच केदार में अंतिम केदार है। जहाँ एक ओर सर्दियों के माह में भीषण बर्फबारी के कारण बाकी चार केदार छह माह के लिए बंद हो जाते हैं, वहीं Kalpeshwar Mandir भक्तों के लिए हर समय खुला रहता है। कहने का अर्थ यह हुआ कि पंच केदारों में से यह एकमात्र केदार है जो 12 महीने खुला रहता है।

कल्पेश्वर मंदिर के आसपास का दृश्य बहुत ही सुंदर और मन मोह लेने वाला है। इसी कारण प्रति वर्ष लाखों लोग कल्पेश्वर मंदिर का ट्रेक (Kalpeshwar Trek) पर जाते हैं और महादेव के चरणों में शीश झुकाते हैं। यदि आप भी कल्पेश्वर मंदिर जाने का सोच रहे हैं तो उससे पहले मंदिर के बारे में सबकुछ जान लिया जाए तो बेहतर रहता है।

Kalpeshwar Mahadev Mandir | कल्पेश्वर महादेव मंदिर की जानकारी

पंच केदारों का मुख्य संबंध भगवान शिव से है और कल्पेश्वर मंदिर की कथा भी भगवान शिव से ही जुड़ी हुई है। हालाँकि यह एक ऐसा मंदिर है जिसका संबंध भगवान शिव के अलावा देवताओं और महान ऋषियों से भी रहा है। इसके बारे में तो आपको कल्पेश्वर महादेव मंदिर का इतिहास पढ़कर ही जानने को मिलेगा।

इतना ही नहीं, पंच केदार में से एक अन्य केदार रुद्रनाथ की यात्रा करने का एक मार्ग भी इस कल्पेश्वर मंदिर से होकर गुजरता है। इस तरह से आप एक साथ दो केदारों के दर्शन करने का सौभाग्य प्राप्त करते हैं। अब यदि आप कल्पेश्वर मंदिर का ट्रेक करने की योजना बना ही रहे हैं तो यहाँ हम आपको मंदिर के बारे में छोटी से लेकर बड़ी जानकारी देने जा रहे हैं।

कल्पेश्वर मंदिर का इतिहास

सबसे पहले कल्पेश्वर महादेव मंदिर का इतिहास जान लेते हैं। मान्यता है कि इस मंदिर का निर्माण महाभारत के समय में पांडवों के द्वारा किया गया था। कल्पेश्वर मंदिर के निर्माण की कथा के अनुसार जब पांडव महाभारत का भीषण युद्ध जीत गए थे तब वे गोत्र हत्या के पाप से मुक्ति पाने के लिए भगवान शिव के पास गए लेकिन शिव उनसे बहुत क्रुद्ध थे।

इसलिए शिवजी बैल का अवतार लेकर धरती में समाने लगे लेकिन भीम ने उन्हें देख लिया। भीम ने उस बैल को पीछे से पकड़ लिया। इस कारण बैल का पीछे वाला भाग वहीं रह गया जबकि चार अन्य भाग चार विभिन्न स्थानों पर निकले। इन पाँचों स्थानों पर पांडवों के द्वारा शिवलिंग स्थापित कर शिव मंदिरों का निर्माण किया गया जिन्हें हम पंच केदार कहते हैं।

  • पंच केदार में कल्पेश्वर है अंतिम केदार

Kalpeshwar Mandir में भगवान शिव के बैल रुपी अवतार की जटाएं प्रकट हुई थी। बैल का जो भाग भीम ने पकड़ लिया था वहां केदारनाथ मंदिर स्थित है। अन्य तीन केदारों में मध्यमहेश्वर (नाभि), तुंगनाथ (भुजाएं) व रुद्रेश्वर (मुख) आते हैं। कल्पेश्वर मंदिर को पंच केदार में से पांचवां या अंतिम केदार के रूप में जाना जाता है।

  • कल्पेश्वर नाम का अर्थ

हिंदू धर्म में कल्प वृक्ष को स्वर्ग का सबसे महत्वपूर्ण वृक्ष माना जाता है। इसी वृक्ष को भगवान श्रीकृष्ण अपनी पत्नी सत्यभामा के कहने पर स्वर्ग लोक से पृथ्वी लोक पर लेकर आए थे। पृथ्वीवासियों के लिए यह वृक्ष वरदान देने वाला होता है। प्राचीन समय में कल्पेश्वर की इस भूमि पर कल्प वृक्ष हुआ करते थे।

मान्यता है कि महान ऋषि दुर्वासा ने इसी जगह पर कल्प वृक्ष के नीचे बैठकर बहुत समय तक ध्यान लगाया था और तपस्या की थी। तभी से इस स्थल को कल्पेश्वर के नाम से जाना जाने लगा।

  • कल्पेश्वर मंदिर की कहानी

जैसा कि हमने आपको ऊपर ही बताया कि Kalpeshwar Mahadev Mandir से जुड़ी एक नहीं बल्कि कई कहानियां हैं। इस मंदिर का संबंध देवताओं और ऋषियों से भी रहा है जिस कारण इसका महत्व अत्यधिक बढ़ जाता है। ऐसे में आइए जाने किस तरह से कल्पेश्वर महादेव मंदिर का इतिहास अन्य महान लोगों से जुड़ा हुआ है।

  1. ऋषि दुर्वासा के अलावा देवराज इंद्र ने भी यहाँ बैठकर तपस्या की थी।
  2. साथ ही यह अन्य ऋषि-मुनियों की भी तप की भूमि थी।
  3. ऋषि दुर्वासा के द्वारा ही यहाँ पर स्वर्ग की अप्सरा उर्वशी को बनाया गया था।
  4. असुरों के अत्याचार से तंग आकर देवताओं ने यहाँ भगवान शिव की स्तुति की थी।
  5. यह भी कहते हैं कि भगवान शिव ने यहीं से समुंद्र मंथन की योजना बनाई थी।

कल्पेश्वर महादेव की धरती सभी के लिए बहुत ही पूजनीय रही है। इसी कारण समय-समय पर यहाँ देवताओं और ऋषि-मुनियों का आगमन होता रहता था। इसके महत्व को देखते हुए ही प्रति वर्ष लाखों की संख्या में लोग Kalpeshwar Trek करके महादेव के दर्शन करते हैं।

कल्पेश्वर मंदिर कहां स्थित है?

कल्पेश्वर मंदिर उत्तराखंड राज्य के गढ़वाल क्षेत्र के अंतर्गत आने वाले चमोली जिले में पड़ता है। समुंद्र तल से इसकी ऊंचाई 2,200 मीटर (7,217 फीट) है। चमोली से आपको गोपेश्वर होते हुए हेलंग पहुंचना पड़ेगा। हेलंग से कुछ किलोमीटर ऊपर उर्गम घाटी में ही कल्पेश्वर मंदिर स्थित है।

इसके लिए सबसे पास का रेलवे स्टेशन ऋषिकेश रेलवे स्टेशन है। वहीं यदि आप हवाई मार्ग से Kalpeshwar Mahadev Mandir जाने का सोच रहे हैं तो उसके लिए आपको देहरादून हवाई अड्डे पर उतरना होगा। इसके बारे में हम आपको नीचे विस्तार से बता देंगे और ट्रेक का मार्ग भी समझा देंगे।

Kalpeshwar Trek | कल्पेश्वर महादेव की यात्रा

पहले के समय में कल्पेश्वर मंदिर पहुँचने के लिए 10 किलोमीटर का लंबा ट्रेक करना पड़ता था। कहने का अर्थ यह हुआ कि इसके लिए आपको पहाड़ों पर 10 किलोमीटर की चढ़ाई करनी पड़ती थी। यह चढ़ाई हेलंग से शुरू होती थी और उर्गम व देवग्राम से होते हुए कल्पेश्वर महादेव पहुँचती थी। हालाँकि अब कल्पेश्वर मंदिर के मार्ग को बहुत ही छोटा कर दिया गया है।

वर्तमान में सरकार के द्वारा देवग्राम गाँव तक सड़क की व्यवस्था कर दी गई है। यहाँ तक आप बाइक, कार या जीप के माध्यम से पहुँच सकते हैं। देवग्राम से कल्पेश्वर मंदिर की दूरी मात्र 300 मीटर के पास ही है जो कि नगण्य है लेकिन फिर भी आपको कल्पेश्वर के शिवलिंग तक पहुँचने के लिए लगभग एक किलोमीटर गुफा के अंदर चलना पड़ेगा।

एक तरह से देवग्राम से लगभग 300 मीटर की दूरी पर कल्पेश्वर महादेव मंदिर की शुरुआत तो हो जाती है लेकिन मुख्य शिवलिंग काफी आगे है।इसके लिए आपको पहाड़ों के बीच में प्राकृतिक रूप से बनी हुई गुफा दिखाई देगी जो कि लगभग एक किलोमीटर लंबी है। ऐसे में आपको गुफा में से गुजर कर ही कल्पेश्वर महादेव के दर्शन हो सकेंगे।

Kalpeshwar Trek तो छोटा सा है लेकिन इसकी संरचना अद्भुत है। कल्पेश्वर शिवलिंग एक गुफा में स्थित है जहाँ भगवान शिव की जटाओं की पूजा की जाती है। गुफा में प्रवेश करने के बाद कल्पेश्वर महादेव के दर्शन के लिए आपको एक किलोमीटर अंदर पैदल चलना पड़ेगा, उसके बाद आप कल्पेश्वर शिवलिंग तक पहुँच पाएंगे। आइए जाने मंदिर में आपको और क्या कुछ देखने को मिलेगा।

  • कल्पेश्वर शिवलिंग

भगवान शिव को जटाधारी या जटेश्वर भी कहा जाता है। मान्यता है कि यह शिवलिंग भगवान शिव की जटाओं या उलझे हुए बालों का प्रतीक है। यह शिवलिंग प्राकृतिक है जो भूमि में से प्रकट हुआ था। कल्पेश्वर शिवलिंग (Kalpeshwar Shivling) को अनादिनाथ कल्पेश्वर के नाम से भी जाना जाता है।

  • कलेवर कुंड

कल्पेश्वर मंदिर के पास ही एक पानी का कुंड है जिसे कलेवर कुंड (Kalevar Kund) के नाम से जाना जाता है। इस कुंड का जल एकदम स्वच्छ व शुद्ध है। मान्यता है कि इस कुंड के जल को पीने से कई शारीरिक बीमारियों से छुटकारा पाया जा सकता है। इसलिए यहाँ आने वाले श्रद्धालु कलेवर कुंड से जल पीना नही भूलते।

  • कल्प्गंगा

कल्पेश्वर मंदिर के पास एक नदी बहती है जिसे कल्प्गंगा (Kalp Ganga) के नाम से जाना जाता है। कल्प्गंगा को पहले हिरण्यवती नदी के नाम से जाना जाता था।

  • दुर्वासा भूमि

कल्प्गंगा के दायीं ओर जो तट है उस भूमि को ऋषि दुर्वासा की भूमि (Durvasa Bhumi Kalpeshwar) कहा जाता है। ऋषि दुर्वासा सतयुग के महान ऋषि माने जाते हैं जिनका उल्लेख रामायण में भी मिलता है।

  • ध्यान बद्री मंदिर

इसी दुर्वासा भूमि पर ध्यान मंदिर (Dhyan Badri Mandir) भी स्थित है। यह सप्त बद्री में से एक मंदिर है।

इस तरह से आपको कल्पेश्वर महादेव मंदिर में शिवलिंग सहित कई अन्य महत्वपूर्ण स्थलों के दर्शन भी होंगे। इतना ही नहीं, आप और ऊपर जाकर रुद्रनाथ महादेव के दर्शन भी कर सकते हैं।

कल्पेश्वर महादेव मंदिर के अन्य नाम

Kalpeshwar Mandir को कई अन्य नामों से भी जाना जाता है। ऐसे में आइए जाने इसके कुछ अन्य प्रचलित नामों के बारे में।

  • कल्पनाथ मंदिर
  • अनादिनाथ कल्पेश्वर मंदिर
  • जटाधारी शिव मंदिर
  • जटेश्वर मंदिर
  • अंतिम या पंचम केदार

कल्पेश्वर मंदिर खुलने व बंद होने की तिथि

जैसा कि हमने आपको ऊपर ही बता दिया कि पंच केदार में से यह एकमात्र ऐसा केदार है जो अपने भक्तों के लिए वर्षभर खुला रहता है। अतः आप किसी भी मौसम या महीने में कल्पेश्वर महादेव के दर्शन हेतु यहाँ आ सकते हैं।

कल्पेश्वर महादेव मंदिर खुलने व बंद होने का समय

मंदिर भक्तों के लिए सुबह 6 बजे खुल जाता है व संध्या में 8 बजे के पास मंदिर के कपाट बंद हो जाते हैं। सर्दियों में मंदिर 7 बजे के आसपास बंद हो जाता है क्योंकि उस समय अँधेरा जल्दी हो जाता है।

कल्पेश्वर मंदिर में आरती का समय

सुबह की आरती 6:30 बजे के पास व संध्या की आरती 7 बजे होती है। संध्या की आरती के बाद कपाट को ज्यादा से ज्यादा 8 बजे तक बंद कर दिया जाता है।

कल्पेश्वर महादेव मंदिर के पुजारी

आज से कई सदियों पहले जब आदि शंकराचार्य ने जन्म लिया था तब उन्होंने पंच केदारों में से चार केदारों की पूजा का कार्य दक्षिण भारत के पंडितों को सौंपा था। इसी कारण कल्पेश्वर मंदिर के पुजारी दक्षिण भारत के नम्बूदिरी ब्राह्मण होते हैं।

कल्पेश्वर मंदिर का मौसम

मैदानी इलाकों की तुलना में यहाँ ठंड का मौसम रहता है। सामान्यतया लोग यहाँ अप्रैल से अक्टूबर के महीने में आते हैं क्योंकि उस समय यहाँ हल्की ठंड पड़ती है। हालाँकि यदि आपको ठंड का मौसम पसंद है तो आप नवंबर से मार्च के महीनों में कल्पेश्वर महादेव की यात्रा कर सकते हैं।

कल्पेश्वर कैसे पहुंचें?

अभी तक तो हमने आपको उर्गम घाटी से कल्पेश्वर मंदिर पहुँचने के बारे में जानकारी दी लेकिन अब प्रश्न यह उठता है कि उर्गम घाटी कैसे पहुंचा जाए अर्थात इसके सबसे पास का हवाई अड्डा या रेलवे स्टेशन कौन सा है। इसलिए अब हम आपको Kalpeshwar Mahadev Mandir पहुँचने के हवाई, रेल व सड़क तीनों मार्गों के बारे में जानकारी देंगे।

  • हवाई मार्ग से कल्पेश्वर मंदिर कैसे जाएं: यदि आप हवाई जहाज से कल्पेश्वर महादेव जाना चाहते हैं तो उर्गम के सबसे नजदीकी हवाई अड्डा देहरादून का ग्रांट जॉली हवाई अड्डा है। यहाँ से स्थानीय बस या टैक्सी करके उर्गम घाटी पहुंचा जा सकता है।
  • रेल मार्ग से कल्पेश्वर मंदिर कैसे जाएं: यदि आप सभी भारतीयों की पसंदीदा रेलगाड़ी से कल्पेश्वर महादेव जा रहे हैं तो सबसे नजदीकी रेलवे स्टेशन ऋषिकेश का है। यहाँ से फिर आपको बस या टैक्सी की सहायता से आगे जाना पड़ेगा।
  • सड़क मार्ग से कल्पेश्वर मंदिर कैसे जाएं: वर्तमान समय में उत्तराखंड राज्य का लगभग हर शहर व कस्बा बसों के द्वारा सड़क मार्ग से अच्छी तरह से जुड़ा हुआ है। आपको दिल्ली, चंडीगढ़, जयपुर इत्यादि से ऋषिकेश तक की सीधी बस आसानी से मिल जाएगी। फिर वहां से आप आगे के लिए स्थानीय बस या टैक्सी कर उर्गम या देवग्राम तक पहुँच सकते हैं।

इस तरह से आप उर्गम या देवग्राम तक पहुँच जाएंगे। वहां से आप Kalpeshwar Trek शुरू कर सकते हैं। एक तरह से इसी ट्रेक से ही रुद्रनाथ महादेव की यात्रा भी शुरू होती है।

कल्पेश्वर में कहां रुकें?

यहाँ रुकने के लिए आपको चिंता करने की आवश्यकता नही है क्योंकि देवग्राम, उर्गम या हेलंग में आपको कई छोटे होटल, होमस्टे इत्यादि की सुविधा मिल जाएगी। अन्यथा आप वापस गोपेश्वर भी जा सकते हैं जहाँ आपको सरकारी विश्रामगृह, बड़े होटल, हॉस्टल, धर्मशालाएं, लॉज इत्यादि सभी प्रकार की सुविधाएँ मिल जाएँगी।

Kalpeshwar Mandir के आसपास घूमने की जगह

पंच केदार में से एक रुद्रनाथ मंदिर का ट्रेक तीन जगहों से शुरू होता है जिसमें से एक रास्ता उर्गम घाटी से भी जाता है। जो लोग रुद्रनाथ के साथ-साथ कल्पेश्वर महादेव के भी दर्शन करना चाहते हैं वे सामान्यतया इसी रास्ते का उपयोग करते हैं। कल्पेश्वर महादेव के दर्शन करने के बाद आप वापस उर्गम घाटी आ जाएं और फिर वहां से 35 से 40 किलोमीटर ऊपर दुमक, बंसी नारायण व पनार होते हुए रुद्रनाथ महादेव के दर्शन करें।

रुद्रनाथ महादेव के अलावा Kalpeshwar Mahadev Mandir के आसपास जो अन्य दर्शनीय स्थल हैं, वे हैं:

इस तरह से आज के इस लेख के माध्यम से आपने कल्पेश्वर महादेव मंदिर (Kalpeshwar Mahadev Mandir) के बारे में समूची जानकारी ले ली है। अधिकतर भक्तगण कल्पेश्वर ट्रेक के साथ ही रुद्रनाथ मंदिर का ट्रेक भी करते हैं। इस तरह से वे एक साथ दो केदारों का दर्शन करने का सौभाग्य पाते हैं।

कल्पेश्वर महादेव मंदिर से संबंधित प्रश्नोत्तर

प्रश्न: कल्पेश्वर मंदिर कैसे पहुंचे?

उत्तर: यदि आप कल्पेश्वर मंदिर जाना चाहते हैं तो सबसे पहले आपको ऋषिकेश या देहरादून से देवग्राम या उर्गम की बस या टैक्सी लेनी होगी वहां से मंदिर कुछ ही दूर है जो ट्रेक करके पहुंचा जाता है

प्रश्न: कल्पेश्वर ट्रेक कितना लंबा है?

उत्तर: जब से सरकार ने देवग्राम तक सड़क बना दी है तब से कल्पेश्वर ट्रेक की दूरी 10 किलोमीटर से घटकर मात्र 300 मीटर की रह गई है

प्रश्न: कल्पेश्वर में किसकी पूजा होती है?

उत्तर: कल्पेश्वर में भगवान शिव के बैल रुपी अवतार की जटाओं की पूजा की जाती है

प्रश्न: मैं उरगाम गांव कैसे पहुंचूं?

उत्तर: यदि आपको उरगाम गांव पहुंचना है तो उसके लिए आपको हरिद्वार, ऋषिकेश या देहरादून से बस या टैक्सी मिल जाएगी

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लेखक के बारें में: कृष्णा

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