रानी सती चालीसा हिंदी में – अर्थ, महत्व व लाभ सहित

Rani Sati Dadi Chalisa

आज हम आपके साथ राणी सती दादी चालीसा (Rani Sati Dadi Chalisa) का पाठ करने जा रहे हैं। भारत देश में समय-समय पर कई महापुरुषों, वीरांगनाओ, गुरुओं ने जन्म लिया है जिन्होंने देश व धर्म का मान बढ़ाने का कार्य किया है। इसी में एक वीरांगना है राणी सती जो राजस्थान के झुंझुनू शहर में पैदा हुई थी। उनकी वीर कथा के कारण ही झुंझुनू शहर में उनका विशाल मंदिर बना हुआ है जहाँ प्रति वर्ष लाखों श्रद्धालु मत्था टेकने आते हैं।

दरअसल राणी सती को दादी माँ कहकर भी संबोधित किया जाता है। आज के इस लेख में आपको राणी सती दादी चालीसा हिंदी में भी पढ़ने को मिलेगी ताकि आप उसका संपूर्ण भावार्थ समझ सकें। अंत में आपको रानी सती चालीसा (Rani Sati Chalisa) के लाभ व महत्व भी जानने को मिलेंगे। आइए सबसे पहले पढ़ते हैं श्री राणी सती दादी चालीसा हिंदी में।

Rani Sati Dadi Chalisa | राणी सती दादी चालीसा

॥ दोहा ॥

श्री गुरु पद पंकज नमन, दूषित भाव सुधार।
राणी सती सुविमल यश, बरणौं मति अनुसार॥

कामक्रोध मदलोभ में, भरम रह्यो संसार।
शरण गहि करूणामयी, सुख सम्पत्ति संचार॥

॥ चौपाई ॥

नमो नमो श्री सती भवानी, जग विख्यात सभी मन मानी।

नमो नमो संकटकूँ हरनी, मन वांछित पूरन सब करनी।

नमो नमो जय जय जगदम्बा, भक्तन काज न होय विलम्बा।

नमो नमो जय-जय जग तारिणी, सेवक जन के काज सुधारिणी।

दिव्य रूप सिर चूँदर सोहे, जगमगात कुण्डल मन मोहे।

माँग सिन्दूर सुकाजन टीकी, गज मुक्ता नथ सुन्दर नीकी।

गल बैजन्ती माल बिराजे, सोलहुँ साज बदन पे साजे।

धन्य भाग्य गुरसामलजी को, महम डोकवा जन्म सती को।

तनधन दास पतिवर पाये, आनन्द मंगल होत सवाये।

जालीराम पुत्र वधू होके, वंश पवित्र किया कुल दोके।

पति देव रण माँय झुझारे, सती रूप हो शत्रु संहारे।

पति संग ले सद् गति पाई, सुर मन हर्ष सुमन बरसाई।

धन्य धन्य उस राणी जी को, सुफल हुवा कर दरस सती का।

विक्रम तेरा सौ बावनकूँ, मंगसिर बदी नौमी मंगलकूँ।

नगर झुँझुनु प्रगटी माता, जग विख्यात सुमंगल दाता।

दूर देश के यात्री आवे, धूप दीप नैवेद्य चढ़ावे।

उछाड़-उछाड़ते हैं आनन्द से, पूजा तन मन धन श्री फल से।

जात जडूला रात जगावे, बाँसल गोती सभी मनावे।

पूजन पाठ पठन द्विज करते, वेद ध्वनि मुख से उच्चरते।

नाना भाँति-भाँति पकवाना, विप्रजनों को न्यूत जिमाना।

श्रद्धा भक्ति सहित हरषाते, सेवक मन वाँछित फल पाते।

जय जय कार करे नर नारी, श्री राणी सती की बलिहारी।

द्वार कोट नित नौबत बाजे, होत श्रृंगार साज अति साजे।

रत्न सिंहासन झलके नीको, पल-पल छिन-छिन ध्यान सती को।

भाद्र कृष्ण मावस दिन लीला, भरता मेला रंग रंगीला।

भक्त सुजन की सकड़ भीड़ है, दर्शन के हित नहीं छीड़ है।

अटल भुवन में ज्योति तिहारी, तेज पुंज जग माँय उजियारी।

आदि शक्ति में मिली ज्योति है, देश देश में भव भौति है।

नाना विधि सो पूजा करते, निशदिन ध्यान तिहारा धरते।

कष्ट निवारिणी, दुःख नाशिनी, करूणामयी झुँझुनू वासिनी।

प्रथम सती नारायणी नामां, द्वादश और हुई इसि धामा।

तिहूँ लोक में कीर्ति छाई, श्री राणी सती की फिरी दुहाई।

सुबह शाम आरती उतारे, नौबत घण्टा ध्वनि टँकारे।

राग छत्तिसों बाजा बाजे, तेरहुँ मण्ड सुन्दर अति साजे।

त्राहि त्राहि मैं शरण आपकी, पूरो मन की आश दास की।

मुझको एक भरोसो तेरो, आन सुधारो कारज मेरो।

पूजा जप तप नेम न जानूँ, निर्मल महिमा नित्य बखानूँ।

भक्तन की आपत्ति हर लेनी, पुत्र पौत्र वर सम्पत्ति देनी।

पढ़े यह चालीसा जो शतबारा, होय सिद्ध मन माँहि बिचारा।

गोपीराम (मैं) शरण ली थारी, क्षमा करो सब चूक हमारी।

॥ दोहा ॥

दुख आपद विपदा हरण, जग जीवन आधार।
बिगड़ी बात सुधारिये, सब अपराध बिसार॥

Rani Sati Chalisa | रानी सती चालीसा – अर्थ सहित

॥ दोहा ॥

श्री गुरु पद पंकज नमन, दूषित भाव सुधार।
राणी सती सुविमल यश, बरणौं मति अनुसार॥

कामक्रोध मदलोभ में, भरम रह्यो संसार।
शरण गहि करूणामयी, सुख सम्पत्ति संचार॥

मैं गुरुओं के चरणों में प्रणाम कर और अपने मन से दूषित विचारों को निकाल कर, राणी सती की महिमा का अपनी बुद्धि के अनुसार वर्णन करता हूँ। इस संसार के प्राणी काम, क्रोध, अहंकार, लालसा इत्यादि से घिरे हुए हैं और जो कोई भी राणी सती की शरण में जाता है तो माता सती उसे सुख व संपत्ति प्रदान करती हैं।

॥ चौपाई ॥

नमो नमो श्री सती भवानी, जग विख्यात सभी मन मानी।

नमो नमो संकटकूँ हरनी, मन वांछित पूरन सब करनी।

नमो नमो जय जय जगदम्बा, भक्तन काज न होय विलम्बा।

नमो नमो जय-जय जग तारिणी, सेवक जन के काज सुधारिणी।

सती जो कि भवानी माता का रूप हैं, उन्हें हमारा नमन है। इनकी प्रसिद्धि इस जगत में हर जगह फैली हुई है। वे हमारे संकटों को दूर कर देती हैं और उन्हें हमारा नमन है। वे हमारे मन की हरेक इच्छा को पूरा कर देती हैं। वे ही जगदंबा का रूप हैं और उनके इस रूप को हमारा नमन है। वे भक्तों के काम पूरे करने में किसी भी तरह की देरी नहीं करती हैं। वे ही इस जगत के प्राणियों का उद्धार करती हैं और अपने सेवकों के बिगड़े हुए काम सुधार देती हैं।

दिव्य रूप सिर चूँदर सोहे, जगमगात कुण्डल मन मोहे।

माँग सिन्दूर सुकाजन टीकी, गज मुक्ता नथ सुन्दर नीकी।

गल बैजन्ती माल बिराजे, सोलहुँ साज बदन पे साजे।

धन्य भाग्य गुरसामलजी को, महम डोकवा जन्म सती को।

उन्होंने अपने सिर पर चुनरी ओढ़ी हुई है जिसमे उनका रूप दिव्य लग रहा है। उनके कानो में कुंडल जगमगाकर सभी का मन मोह रहे हैं। उन्होंने अपनी माँग में सिन्दूर का तिलक लगाया हुआ है और नाक में नथ पहनी हुई है। गले में बैजयन्ती के पुष्पों की माला है तो साथ ही सोलह श्रृंगार राणी सती ने किया हुआ है। गुरसामल जी के तो भाग खुल गए जो उनके घर में राणी सती का जन्म हुआ। राणी सती का जन्मस्थान डोकवा गाँव था।

तनधन दास पतिवर पाये, आनन्द मंगल होत सवाये।

जालीराम पुत्र वधू होके, वंश पवित्र किया कुल दोके।

पति देव रण माँय झुझारे, सती रूप हो शत्रु संहारे।

पति संग ले सद् गति पाई, सुर मन हर्ष सुमन बरसाई।

राणी सती का विवाह करने को पूरे धूमधाम से जालीराम अपने पुत्र को लेकर आये और बहुत ही आनंद के साथ उनके पुत्र टंडन के साथ राणी सती का विवाह संपन्न हुआ। राणी सती ने जालीराम की पुत्र वधु बनकर उनके वंश का मान बढ़ाने का कार्य किया। इसके पश्चात राणी सती के पति की युद्धभूमि में मृत्यु हो गयी तो उन्होंने अपने पति के हत्यारे को मारकर उसका प्रतिशोध लिया। फिर राणी सती अपने पति की चिता पर बैठकर सती हो गयी। यह दृश्य देखकर आकाश से देवताओं ने हर्षित होकर पुष्प वर्षा की।

धन्य धन्य उस राणी जी को, सुफल हुवा कर दरस सती का।

विक्रम तेरा सौ बावनकूँ, मंगसिर बदी नौमी मंगलकूँ।

नगर झुँझुनु प्रगटी माता, जग विख्यात सुमंगल दाता।

दूर देश के यात्री आवे, धूप दीप नैवेद्य चढ़ावे।

वह राणी सती बहुत ही धन्य हैं जिन्होंने अपने पति का प्रतिशोध लिया और फिर सती हो गयी। इसके पश्चात माता सती झुंझुनू नगरी में प्रकट हुई और वहां उनके नाम का बहुत ही विशाल मंदिर बनवाया गया। इससे उनकी प्रसिद्धि बहुत दूर तक फैल गयी। उनके दर्शन करने तो दूर-दूर से भक्तगण आते हैं और उन्हें धूप, दीप व नैवेद्य चढ़ाते हैं।

उछाड़-उछाड़ते हैं आनन्द से, पूजा तन मन धन श्री फल से।

जात जडूला रात जगावे, बाँसल गोती सभी मनावे।

पूजन पाठ पठन द्विज करते, वेद ध्वनि मुख से उच्चरते।

नाना भाँति-भाँति पकवाना, विप्रजनों को न्यूत जिमाना।

सभी भक्तगण आनंद से उछल-उछल कर पूरे तन, मन व धन के साथ राणी सती दादी की पूजा करते हैं। वे जडूला जाति व बंसल गोत्र में बहुत प्रसिद्ध हैं। उनके भक्तगण पूरे विधि-विधान के साथ राणी सती दादी चालीसा का पाठ करते हैं और वेदों का अध्ययन करते हैं। राणी सती को भोग लगाने के लिए उनके भक्त कई तरह के पकवान बनाते हैं और पंडितों को जिमाते हैं।

श्रद्धा भक्ति सहित हरषाते, सेवक मन वाँछित फल पाते।

जय जय कार करे नर नारी, श्री राणी सती की बलिहारी।

द्वार कोट नित नौबत बाजे, होत श्रृंगार साज अति साजे।

रत्न सिंहासन झलके नीको, पल-पल छिन-छिन ध्यान सती को।

राणी सती के भक्त श्रद्धा भाव के साथ खुश दिखाई देते हैं और उनके मन की हरेक इच्छा भी पूरी हो जाती है। वे सभी राणी सती के नाम का जयकारा लगाते हैं। राणी सती के दरबार में तो ढोल-नगाड़े बजते हैं और उनका प्रतिदिन सुन्दर श्रृंगार किया जाता है। वे रत्नों से जड़ित सिंहासन पर विराजती हैं और हम सभी हर पल उनका ही ध्यान करते हैं।

भाद्र कृष्ण मावस दिन लीला, भरता मेला रंग रंगीला।

भक्त सुजन की सकड़ भीड़ है, दर्शन के हित नहीं छीड़ है।

अटल भुवन में ज्योति तिहारी, तेज पुंज जग माँय उजियारी।

आदि शक्ति में मिली ज्योति है, देश देश में भव भौति है।

भाद्रपद माह के कृष्ण पक्ष की अमावस्या के दिन राणी सती की नगरी में मेले का आयोजन किया जाता है। उस समय राणी सती दादी के दर्शन करने के लिए भक्तों की भीड़ उमड़ पड़ती है। उनकी ज्योति अटल है जिससे संपूर्ण विश्व में प्रकाश हो रहा है। उनकी ज्योति माता आदि शक्ति में मिल गयी है और उसी से ही हर देश व भवन में प्रकाश व्याप्त है।

नाना विधि सो पूजा करते, निशदिन ध्यान तिहारा धरते।

कष्ट निवारिणी, दुःख नाशिनी, करूणामयी झुँझुनू वासिनी।

प्रथम सती नारायणी नामां, द्वादश और हुई इसि धामा।

तिहूँ लोक में कीर्ति छाई, श्री राणी सती की फिरी दुहाई।

हम कई तरह की विधियों से आपकी पूजा करते हैं और दिन-रात आपका ध्यान करते हैं। राणी सती कष्टों को दूर करने वाली, दुखों का नाश करने वाली, करुणा बरसाने वाली तथा झुंझुनू नगरी में वास करने वाली हैं। पहले उनका नाम नारायणी था लेकिन सती हो जाने के पश्चात उनका नाम राणी सती दादी पड़ गया। इस कृत्य के कारण तीनों लोकों में उनका यश फैल गया और सभी ने उनके नाम की दुहाई दी।

सुबह शाम आरती उतारे, नौबत घण्टा ध्वनि टँकारे।

राग छत्तिसों बाजा बाजे, तेरहुँ मण्ड सुन्दर अति साजे।

त्राहि त्राहि मैं शरण आपकी, पूरो मन की आश दास की।

मुझको एक भरोसो तेरो, आन सुधारो कारज मेरो।

हम सभी सुबह-शाम आपके नाम की आरती करते हैं और ढोल-नगाड़े बजाते हैं। आपकी पूजा में तो छत्तीस तरह के बाजे बजते हैं और तेरह तरह के मण्डप सजते हैं। मैं त्राहिमाम करता हुआ आपकी शरण में आया हूँ। मुझे केवल आपका ही भरोसा है और अब आप मेरे बिगड़े हुए कामो को सुधार दीजिये।

पूजा जप तप नेम न जानूँ, निर्मल महिमा नित्य बखानूँ।

भक्तन की आपत्ति हर लेनी, पुत्र पौत्र वर सम्पत्ति देनी।

पढ़े यह चालीसा जो शतबारा, होय सिद्ध मन माँहि बिचारा।

गोपीराम (मैं) शरण ली थारी, क्षमा करो सब चूक हमारी।

मैं तो पूजा, जप, तपस्या इत्यादि कुछ नहीं जानता हूँ और निर्मल मन के साथ आपके नाम की महिमा गाता हूँ। आप अपने भक्तों की हर विपत्ति दूर कर देती हैं और उन्हें संतान, पौत्र, जीवनसाथी तथा संपत्ति देती हैं। जो कोई भी इस राणी सती दादी चालीसा को सौ बार पढ़ लेता है, उसके सभी काम सिद्ध हो जाते हैं। रानी सती चालीसा के लेखक श्री गोपीराम जी उनकी शरण में हैं और उनसे हुई किसी भी प्रकार की भूल के लिए राणी सती से क्षमा माँग रहे हैं।

॥ दोहा ॥

दुख आपद विपदा हरण, जग जीवन आधार।
बिगड़ी बात सुधारिये, सब अपराध बिसार॥

आप ही हमारे दुखों, पीड़ा, संकटों तथा कष्टों का हरण कर सकती हैं और आप ही हमारे जीवन का आधार हैं। अब आप हमारे अपराधों को क्षमा कर, हमारे सभी बिगड़े हुए काम, बातों तथा जीवन को सुधार दीजिये।

राणी सती दादी चालीसा का महत्व

देश में समय-समय पर कई ऐसे महापुरुषों व वीरांगनाओं ने जन्म लिया है जिन्होंने अपने कर्मों से देश व दुनिया को एक महत्वपूर्ण संदेश दिया है। राणी सती भी कुछ ऐसे ही महान कर्म करने के लिए जन्मी थी जिन्होंने युद्ध भूमि में अपने पति की मृत्यु हो जाने पर उसके हत्यारे का वध कर दिया था। इसके पश्चात वे अपने पति के साथ ही अग्नि की चिता में जलकर भस्म हो गयी थी। इसके बाद से ही उनकी मान्यता झुंझुनू नगरी से पूरे राजस्थान और फिर भारतवर्ष में फैल गयी।

यही कारण है कि लोगों में उनकी आस्था व श्रद्धा बढ़ती चली गयी और देशभर से लाखों की संख्या में श्रद्धालु उनके मंदिर में आने लगे। राणी सती के आदर्शों, कर्मों, शक्तियों तथा गुणों को दिखाने के उद्देश्य से ही यह रानी सती चालीसा लिखी गयी है। इस चालीसा के माध्यम से राणी सती के महत्व को ही बताने का कार्य किया गया है। ऐसे में हर किसी को राणी सती दादी चालीसा का पाठ करना चाहिए।

रानी सती चालीसा के फायदे

अब यदि आप नित्य रूप से राणी सती दादी की चालीसा का पाठ करते हैं और उनका ध्यान करते हैं तो इससे कई तरह के लाभ देखने को मिलते हैं। इसका सबसे बड़ा लाभ तो यही है कि आपके अंदर अपने शत्रुओं से निपटने की शक्ति विकसित होती है। इसी के साथ ही आपके जीवन में जो भी विपदाएं या संकट आ रहे थे, उन्हें सुलझाने का मार्ग प्रशस्त होता है। इससे आप बेहतरी से अपना कार्य कर पाते हैं और उसमें सफल होते हैं।

रानी सती चालीसा के माध्यम से व्यक्ति का मानसिक विकास तेजी से होता है तथा वह साहसी बनता है। यदि आपको किसी चीज़ का भय सताता है या कोई शंका मन में बनी रहती है, तो वह भी स्वतः ही दूर हो जाती है और आपको शांति का अनुभव होता है। ऐसे में श्री राणी सती दादी की चालीसा कई तरह के लाभ देने वाली होती है।

निष्कर्ष

आज के इस लेख के माध्यम से आपने राणी सती दादी चालीसा हिंदी में अर्थ सहित (Rani Sati Dadi Chalisa) पढ़ ली हैं। साथ ही आपने रानी सती चालीसा के फायदे और महत्व के बारे में भी जान लिया है। यदि आप हमसे कुछ पूछना चाहते हैं तो नीचे कमेंट कर सकते हैं। हम जल्द से जल्द आपके प्रश्न का उत्तर देने का प्रयास करेंगे।

राणी सती दादी चालीसा से संबंधित प्रश्नोत्तर

प्रश्न: रानी सती किसकी कुलदेवी है?

उत्तर: रानी सती किसकी कुलदेवी होगी और किसकी नहीं, यह पूर्ण रूप से व्यक्ति के समाज, परिवार, कुल, गोत्र व जाति इत्यादि कई कारकों पर निर्भर करता है।

प्रश्न: रानी सती माता का मेला कब लगता है?

उत्तर: प्रतिवर्ष भाद्रपद माह की अमावस्या के दिन झुंझुनू नगरी में राणी सती मंदिर में उनके नाम का मेला आयोजित किया जाता है।

प्रश्न: रानी सती मंदिर क्या है?

उत्तर: रानी सती का मंदिर राजस्थान राज्य के झुंझुनू नगरी में स्थित है जहाँ देशभर से लाखों की संख्या में श्रद्धालु प्रतिवर्ष पहुँचते हैं।

प्रश्न: रानी सती माता कौन है?

उत्तर: रानी सती राजस्थान के झुंझुनू जिले में जन्मी एक वीरांगना थी जिन्होंने अपने पति के हत्यारे को मार दिया था और उसके बाद सती हो गयी थी।

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लेखक के बारें में: कृष्णा

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