
आज हम आपके सामने राम सेतु की सच्चाई रखने जा रहे हैं। त्रेता युग में जब श्रीराम को लंका में रावण की नगरी में कैद माता सीता को छुड़ाने के लिए समुद्र को पार करना था तब उस पर राम सेतु का निर्माण किया गया था। हालाँकि सभी के मन में यह प्रश्न उठता है कि बिना डूबे समुद्र पर इतने बड़े और विशाल राम सेतु का निर्माण कैसे हुआ था!!
इसके पीछे नल नील का चमत्कार ही था। उन्होंने अपने को मिले श्राप को वरदान में बदल दिया था। हालाँकि आज हम आपके सामने उस वरदान या दिव्य शक्ति के बारे में नहीं बल्कि राम सेतु पत्थर (Ram Setu Pathar) के बारे में बात करने वाले हैं। यहाँ हम आपको बताएँगे कि उस समय किस तकनीक के तहत राम सेतु का इतना भव्य निर्माण किया गया था जिसके प्रमाण हम आज तक देखते हैं।
राम सेतु की सच्चाई
हिंदू धर्म का इतिहास ना केवल आध्यात्मिक दृष्टि से अपितु वैज्ञानिक दृष्टि से भी बहुत उन्नत रहा है। इसका सबसे बड़ा उदाहरण है हमारे महापुरुषों के द्वारा किया गया रामसेतु का निर्माण। यह इतना विशाल व अद्वितीय निर्माण था कि आज तक वैज्ञानिक इसका लोहा मानते हैं व इसकी प्रशंसा करते नहीं थकते।
समय बीतने के साथ-साथ यह जर्जर होता गया व 15वीं शताब्दी में समुंद्र में आए भयानक चक्रवात के बाद यह समुंद्र के अंदर डूब गया। उससे पहले यह भारत व श्रीलंका के लोगों के बीच आवाजाही के लिए प्रमुख मार्ग था। इस सेतु के द्वारा लोग अपना सामान, वाहन इत्यादि के साथ यात्रा करते थे। लेकिन सबसे ज्यादा आश्चर्यजनक बात यह है कि आखिर इस सेतु का निर्माण किस प्रकार हुआ कि इसके पत्थर पानी में डूबने की बजाए तैरने लगे।
राम सेतु पत्थर (Ram Setu Pathar)
इस बात पर वर्षों तक देश-विदेश के कई वैज्ञानिकों ने शोध किया व पता लगाया कि आखिर राम सेतु का निर्माण कैसे हुआ था और इसके पीछे का रहस्य क्या है। वैज्ञानिकों के द्वारा किए गए शोध से पता चला कि समुंद्र के पानी पर सेतु बनाने के लिए जिन पत्थरों का इस्तेमाल किया गया था वह दरअसल ज्वालामुखी के विस्फोट में लावा से निकले पत्थर थे।
चूँकि ज्वालामुखी के अंदर का तापमान इतना अधिक होता है कि वह कठोर से कठोर वस्तु को भी पिघला दे इसलिए रामसेतु के निर्माण में इसके लावा के पत्थरों का इस्तेमाल किया गया था। जब यह लावा के पत्थर कम तापमान के संपर्क में आते हैं तो यह अत्यधिक कठोर आचरण वाले हो जाते हैं। इसमें कई सूक्ष्म छिद्र होते हैं जिनमें हवा भरी होती है।
जब इन पत्थरों को पानी में फेंका जाता है तो इन छिद्रों में हवा भरी होने के कारण यह स्पंजी बन जाते हैं। इस कारण इनका घनत्व पानी से कम हो जाता है व ये पानी में तैरने लग जाते हैं। इसलिए जब भगवान श्रीराम के नेतृत्व में समुंद्र पर सेतु का निर्माण किया गया तब विभिन्न स्थानों में वानर सेना को भेजकर ज्वालामुखी के इन्हीं पत्थरों, चट्टानों को मंगवाया गया था ताकि ये पानी में डूबे नहीं। इन्हें ही हम राम सेतु पत्थर (Ram Setu Pathar) के नाम से जानते हैं।
वानर सेना के अथक प्रयास के कारण केवल पाँच दिनों के अंदर ही भारत से श्रीलंका के बीच 100 योजन के सेतु का निर्माण हो गया जो आज तक विद्यमान है। आशा है कि अब आपको भी राम सेतु की सच्चाई पता चल गई होगी।
राम सेतु की सच्चाई से संबंधित प्रश्नोत्तर
प्रश्न: रामसेतु के बारे में विज्ञान क्या कहता है?
उत्तर: रामसेतु के बारे में वैज्ञानिकों ने वर्षों तक अध्ययन किया और बताया कि रामसेतु के पत्थर ज्वालामुखी के लावे से बने हैं। इन पत्थरों को जब समुद्र में डाला जाता है तो वे स्पंजी हो जाते हैं और तैरने लगते हैं।
प्रश्न: भगवान राम ने राम सेतु क्यों तोड़ा?
उत्तर: इसके बारे में अलग-अलग मत देखने को मिलते हैं। कोई कहता है कि लंका विजय के बाद श्रीराम ने राम सेतु को तोड़ दिया था तो कोई इसे भ्रामक जानकारी मानते हैं।
प्रश्न: क्या राम सेतु सच्ची कहानी है?
उत्तर: यदि राम सेतु सच्ची कहानी नहीं होती तो आज के समय में हम भारत से लंका के बीच जिस पुल को देखते हैं, वह क्या है!! ऐसे में राम सेतु पूर्ण रूप से सच्ची घटना पर आधारित है।
प्रश्न: क्या राम सेतु असली था?
उत्तर: राम सेतु असली था ही नहीं बल्कि है भी, जिसे हम अपनी आँखों से देख सकते हैं। इसे श्रीराम ने लंका पर चढ़ाई करने के लिए नल नील की सहायता से बनवाया था।
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